सुनि जानकी परम सुखु पावा
सुनि जानकी परम सुखु पावा
चौपाई १, दोहा ६ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि जानकी परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा॥ तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना॥ १ ॥
अर्थ
जानकीजी ने सुनकर परम सुख पाया और आदरपूर्वक उनके चरणों में सिर नवाया। तब कृपानिधान श्रीरामजी ने मुनि से कहा--आज्ञा हो तो अब दूसरे वन में जाऊँ।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अनसूया का सीता को उपदेश” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीता और अनसूया के मिलन तथा अनसूया द्वारा पातिव्रत धर्म के उपदेश का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
अनसूया का सीता को उपदेश