सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ
सोरठा ५ (क) · अरण्यकाण्ड
सोरठा पाठ
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ। जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय॥ ५ (क) ॥
अर्थ
स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किन्तु पति की सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है। [पातिव्रत धर्म के कारण ही] आज भी तुलसीजी भगवान् को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अनसूया का सीता को उपदेश” प्रकरण का सोरठा ५ (क) है। इस प्रकरण में सीता और अनसूया के मिलन तथा अनसूया द्वारा पातिव्रत धर्म के उपदेश का वर्णन है।
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अनसूया का सीता को उपदेश