तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला
दोहा ४ · सुन्दरकाण्ड
दोहा पाठ
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥ ४ ॥
अर्थ
हे तात! स्वर्ग और अपवर्ग के सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर [दूसरे पलड़े पर रखे हुए] उस सुख के बराबर नहीं हैं, जो लव [क्षण]-मात्र के सत्संग से होता है।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “लंकिनी वध और लंका प्रवेश” प्रकरण का दोहा ४ है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा स्वर्णमयी लंका दर्शन, लंकिनी को परास्त कर सूक्ष्म रूप से नगर प्रवेश का वर्णन है।
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लंकिनी वध और लंका प्रवेश