उमा न कछु कपि कै अधिकाई

चौपाई ५, दोहा ३ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥ गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥ ५ ॥

अर्थ

[शिवजी कहते हैं-- ] हे उमा! इसमें वानर हनुमानजी की कुछ बड़ाई नहीं है। यह प्रभु का प्रताप है, जो काल को भी खा जाता है। पर्वत पर चढ़कर उन्होंने लंका देखी। [वह] अत्यन्त दुर्गविशेषी [किला] है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “लंकिनी वध और लंका प्रवेश” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा स्वर्णमयी लंका दर्शन, लंकिनी को परास्त कर सूक्ष्म रूप से नगर प्रवेश का वर्णन है।

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लंकिनी वध और लंका प्रवेश