करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन
छन्द ३, दोहा ३ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
छन्द पाठ
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥ एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥ ३ ॥
अर्थ
भयंकर शरीर वाले करोड़ों योद्धा यत्न करके नगर की चारों दिशाओं में रखवाली करते हैं। कहीं दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरों को खा रहे हैं। तुलसीदास ने इनकी कथा इसीलिए कुछ थोड़ी-सी कही है कि ये निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजी के बाणरूपी तीर्थ में शरीरों को त्यागकर परमगति पावेंगे।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “लंकिनी वध और लंका प्रवेश” प्रकरण का छन्द ३, दोहा ३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा स्वर्णमयी लंका दर्शन, लंकिनी को परास्त कर सूक्ष्म रूप से नगर प्रवेश का वर्णन है।
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लंकिनी वध और लंका प्रवेश