बिकल होसि तैं कपि कें मारे
बिकल होसि तैं कपि कें मारे
चौपाई ४, दोहा ४ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥ तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥ ४ ॥
अर्थ
जब तू बंदर के मारे जाने से व्याकुल हो जाय, तब तू राक्षसों का संहार हुआ जान लेना। हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैंने श्रीरामचन्द्रजी के दूत को नेत्रों से देख लिया।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “लंकिनी वध और लंका प्रवेश” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा स्वर्णमयी लंका दर्शन, लंकिनी को परास्त कर सूक्ष्म रूप से नगर प्रवेश का वर्णन है।
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लंकिनी वध और लंका प्रवेश