मसक समान रूप कपि धरी
मसक समान रूप कपि धरी
चौपाई १, दोहा ४ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥ नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥ १ ॥
अर्थ
हनुमानजी मच्छर के समान छोटा-सा रूप धारण कर नरहरी का स्मरण करके लंका को चले। [लंकाके द्वार पर] लंकिनी नाम की एक राक्षसी रहती थी। वह बोली-- मुझे निरादर करके (बिना मुझसे पूछे) कहाँ चला जा रहा है?
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “लंकिनी वध और लंका प्रवेश” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा स्वर्णमयी लंका दर्शन, लंकिनी को परास्त कर सूक्ष्म रूप से नगर प्रवेश का वर्णन है।
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लंकिनी वध और लंका प्रवेश