बन बाग उपबन बाटिका सर कूप
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप
छन्द २, दोहा ३ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
छन्द पाठ
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं। नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥ कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं। नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥ २ ॥
अर्थ
वन, बाग, उपवन, बाटिकाएँ, सरोवर, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित हैं। मनुष्य, नाग, देवताओं और गन्धर्वों की कन्याएँ रूप से मुनियों के मन को मोहित करती हैं। कहीं मल्ल-देह विशाल पर्वत के समान अत्यन्त बलवान गरज रहे हैं। अनेकों अखाड़ों में वे बहुत प्रकार से भिड़ते हैं और एक-एक को ललकारते हैं।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “लंकिनी वध और लंका प्रवेश” प्रकरण का छन्द २, दोहा ३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा स्वर्णमयी लंका दर्शन, लंकिनी को परास्त कर सूक्ष्म रूप से नगर प्रवेश का वर्णन है।
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लंकिनी वध और लंका प्रवेश