कर जोरें सुर दिसिप बिनीता
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता
चौपाई ४, दोहा २० के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥ देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥ ४ ॥
अर्थ
देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रता के साथ भयभीत हुए सब रावण की भृकुटि देख रहे हैं। (उसका रुख देख रहे हैं।) उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमानजी के मन में जरा भी डर नहीं हुआ। वे ऐसे निःशंक खड़े रहे जैसे सर्पों के समूह में गरुड़ निःशंक (निर्भय) रहते हैं।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “अशोकवाटिका विध्वंस, नागपाश में बँधना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा अशोकवाटिका विध्वंस, अक्षयकुमार वध और मेघनाद के नागपाश में बँधकर रावण-सभा में जाने का वर्णन है।
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अशोकवाटिका विध्वंस, नागपाश में बँधना