जासु नाम जपि सुनहु भवानी
जासु नाम जपि सुनहु भवानी
चौपाई २, दोहा २० के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥ तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥ २ ॥
अर्थ
[शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण) के बन्धन को काट डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धन में आ सकता है? किन्तु प्रभु के कार्य के लिये हनुमानजी ने स्वयं अपने को बँधा लिया।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “अशोकवाटिका विध्वंस, नागपाश में बँधना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा अशोकवाटिका विध्वंस, अक्षयकुमार वध और मेघनाद के नागपाश में बँधकर रावण-सभा में जाने का वर्णन है।
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अशोकवाटिका विध्वंस, नागपाश में बँधना