तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा
चौपाई ४, दोहा १९ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥ मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥ ४ ॥
अर्थ
उन सबको मारकर फिर मेघनाद से लड़ने लगे। [लड़ते हुए वे ऐसे मालूम होते थे] मानो दो गजराज (श्रेष्ठ हाथी) भिड़ गए हों। हनुमानजी ने उसे एक घूँसा मारकर वृक्ष पर जा चढ़े। उसको क्षणभर के लिये मूर्च्छा आ गयी।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “अशोकवाटिका विध्वंस, नागपाश में बँधना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा अशोकवाटिका विध्वंस, अक्षयकुमार वध और मेघनाद के नागपाश में बँधकर रावण-सभा में जाने का वर्णन है।
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अशोकवाटिका विध्वंस, नागपाश में बँधना