मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू

चौपाई ४, दोहा ५६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू॥ काल ब्याल कर भच्छक जोई। सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई॥ ४ ॥

अर्थ

मैं-तू ( भेद-भाव) और ममतारूपी मूढ़ता को त्यागो। महामोह (अज्ञान)-रूपी रात्रि में सो रहे हो, सो जाग उठो। जो कालरूपी सर्प का भी भक्षक है, कहीं स्वप्न में भी वह रण में जीता जा सकता है ?।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “हनुमान का संजीवनी के लिये प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ५६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमान द्वारा सुषेण वैद्य को लाना, संजीवनी हेतु प्रस्थान, कालनेमि की माया का भेदन और मकरी-उद्धार का वर्णन है।

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हनुमान का संजीवनी के लिये प्रस्थान