अस कहि चला रचिसि मग माया
अस कहि चला रचिसि मग माया
चौपाई १, दोहा ५७ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया॥ मारुतसुत देखा सुभ आश्रम। मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम॥ १ ॥
अर्थ
वह मन-ही-मन ऐसा कहकर चला और उसने मार्ग में माया रची। तालाब, मन्दिर और सुन्दर बाग बनाया। हनुमानजी ने सुन्दर आश्रम देखकर सोचा कि मुनि से पूछकर जल पी लूँ, जिससे थकावट दूर हो जाए।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “हनुमान का संजीवनी के लिये प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमान द्वारा सुषेण वैद्य को लाना, संजीवनी हेतु प्रस्थान, कालनेमि की माया का भेदन और मकरी-उद्धार का वर्णन है।
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हनुमान का संजीवनी के लिये प्रस्थान