जौं मन बच क्रम मम उर
जौं मन बच क्रम मम उर
चौपाई ४, दोहा १०९ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं॥ तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना॥ ४ ॥
अर्थ
[सीताजी ने लीलासे कहा--] यदि मन, वचन और कर्म से मेरे हृदय में श्रीरघुवीर को छोड़कर दूसरी गति (अन्य किसी का आश्रय) नहीं है, तो अग्निदेव, जो सबके मन की गति जानते हैं, [मेरे भी मन की गति जानकर] मेरे लिये चन्दन के समान शीतल हो जायँ।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “सीताजी को कुशल समाचार और अग्नि परीक्षा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १०९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा सीताजी को राम की कुशल सुनाना और सीताजी की अग्नि परीक्षा द्वारा पवित्रता प्रकट होने का वर्णन है।
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सीताजी को कुशल समाचार और अग्नि परीक्षा