दूरिहि ते प्रनाम कपि कीन्हा

चौपाई ३, दोहा १०७ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

दूरिहि ते प्रनाम कपि कीन्हा। रघुपति दूत जानकी चीन्हा॥ कहहु तात प्रभु कृपानिकेता। कुसल अनुज कपि सेन समेता॥ ३ ॥

अर्थ

हनुमानजी ने [सीताजी को] दूर से ही प्रणाम किया। जानकीजी ने पहचान लिया कि यह वही श्रीरघुनाथजी का दूत है [और पूछा-- ] हे तात! कहो, कृपा के धाम मेरे प्रभु छोटे भाई और वानरों की सेनासहित कुशल से तो हैं ?

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “सीताजी को कुशल समाचार और अग्नि परीक्षा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १०७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा सीताजी को राम की कुशल सुनाना और सीताजी की अग्नि परीक्षा द्वारा पवित्रता प्रकट होने का वर्णन है।

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सीताजी को कुशल समाचार और अग्नि परीक्षा