श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि
छन्द १, दोहा १०९ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली। जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली॥ प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे। प्रभु चरित काहुँन लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे॥ १ ॥
अर्थ
प्रभु श्रीरामजी का स्मरण करके और जिनके चरण महादेवजी के द्वारा वन्दित हैं तथा जिनमें सीताजी की अत्यन्त विशुद्ध प्रीति है, उन कोसलपति की जय बोलकर जानकीजी ने चन्दन के समान शीतल हुई अग्नि में प्रवेश किया। प्रतिबिम्ब (सीताजी की छायामूर्ति) और उनका लौकिक कलंक प्रचण्ड अग्नि में जल गये। प्रभु के इन चरित्रों को किसी ने नहीं जाना। देवता, सिद्ध और मुनि सब आकाश में खड़े देखते हैं।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “सीताजी को कुशल समाचार और अग्नि परीक्षा” प्रकरण का छन्द १, दोहा १०९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा सीताजी को राम की कुशल सुनाना और सीताजी की अग्नि परीक्षा द्वारा पवित्रता प्रकट होने का वर्णन है।