अति हरष मन तन पुलक लोचन
छन्द, दोहा १०७ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा। का देउँ तोहि त्रैलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा॥ सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं। रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं॥
अर्थ
श्रीजानकीजी के हृदय में अत्यन्त हर्ष हुआ। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में [आनन्दाश्रुओं का] जल छा गया। वे बार-बार कहती हैं--हे हनुमान्! मैं तुझे क्या दूँ? इस वाणी (समाचार) के समान तीनों लोकों में और कुछ भी नहीं है! [हनुमानजी ने कहा--] हे माता! सुनिये, मैंने आज निःसन्देह सारे जगत् का राज्य पा लिया, जो मैं रण में शत्रु-सेना को जीतकर भाई सहित निर्विकार श्रीरामजी को देख रहा हूँ॥
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “सीताजी को कुशल समाचार और अग्नि परीक्षा” प्रकरण का छन्द, दोहा १०७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा सीताजी को राम की कुशल सुनाना और सीताजी की अग्नि परीक्षा द्वारा पवित्रता प्रकट होने का वर्णन है।