धरि रूप पावक पानि गहि श्री
छन्द २, दोहा १०९ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो। जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो॥ सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली। नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली॥ २ ॥
अर्थ
तब अग्नि ने शरीर धारण करके वेदों में और जगत् में प्रसिद्ध वास्तविक श्री (सीताजी) का हाथ पकड़ उन्हें श्रीरामजी को वैसे ही समर्पित किया जैसे क्षीरसागर ने विष्णुभगवान् को लक्ष्मी समर्पित की थी। वे सीताजी श्रीरामचन्द्रजी के वाम भाग में विराजित हुईं। उनकी उत्तम शोभा अत्यन्त ही सुन्दर है। मानो नये खिले हुए नीले कमल के पास सोने के कमल की कली सुशोभित हो।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “सीताजी को कुशल समाचार और अग्नि परीक्षा” प्रकरण का छन्द २, दोहा १०९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हनुमानजी द्वारा सीताजी को राम की कुशल सुनाना और सीताजी की अग्नि परीक्षा द्वारा पवित्रता प्रकट होने का वर्णन है।