लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें

चौपाई ४, दोहा २६१ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें॥ तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥ ४ ॥

अर्थ

लेते, चढ़ाते और जोर से खींचते हुए किसी ने नहीं लखा (अर्थात् ये तीनों काम इतनी फुर्ती से हुए कि धनुष को कब उठाया, कब चढ़ाया और कब खींचा, इसका किसी को पता नहीं लगा); सब ने श्रीरामजी को [धनुष खींचे] खड़े देखा। उसी क्षण श्रीरामजी ने धनुष को बीच से तोड़ डाला। भरे भुवन में घोर, कठोर ध्वनि गूँज उठी।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “धनुषभंग” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २६१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा शिवधनुष-भंग और सभा में हर्षोल्लास का वर्णन है।

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धनुषभंग