भरे भुवन घोर कठोर रव रबि

छन्द, दोहा २६१ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले। चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले॥ सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं। कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं॥

अर्थ

घोर, कठोर शब्द से [सब] लोक भर गये; सूर्य के घोड़े मार्ग छोड़कर चलने लगे। दिग्गज चीत्कार करने लगे, धरती डोलने लगी, शेष, वाराह और कच्छप कलमला उठे। देवता, असुर और मुनि कानों पर हाथ रखकर सब व्याकुल होकर विचारने लगे। तुलसीदास कहते हैं, जब [सब को निश्चय हो गया कि] श्रीरामजी ने धनुष को तोड़ डाला, तब सब 'जयति' का वचन उच्चारने लगे।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “धनुषभंग” प्रकरण का छन्द, दोहा २६१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा शिवधनुष-भंग और सभा में हर्षोल्लास का वर्णन है।

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धनुषभंग