रही भुवन भरि जय जय बानी
रही भुवन भरि जय जय बानी
चौपाई ४, दोहा २६२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुषभंग धुनि जात न जानी॥ मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजेउ राम संभुधनु भारी॥ ४ ॥
अर्थ
सारे ब्रह्माण्ड में जय-जयकार की ध्वनि छा गयी, जिसमें धनुष टूटने की ध्वनि जान ही नहीं पड़ती। जहाँ-तहाँ स्त्री-पुरुष प्रसन्न होकर कह रहे हैं कि श्रीरामचन्द्रजी ने शिवजी के भारी धनुष को तोड़ डाला।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “धनुषभंग” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २६२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा शिवधनुष-भंग और सभा में हर्षोल्लास का वर्णन है।
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धनुषभंग