श्रीहत भए भूप धनु टूटे

चौपाई ३, दोहा २६३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

श्रीहत भए भूप धनु टूटे। जैसें दिवस दीप छबि छूटे॥ सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती। जनु चातकी पाइ जलु स्वाती॥ ३ ॥

अर्थ

धनुष टूट जाने पर राजालोग ऐसे श्रीहीन (निस्तेज) हो गये, जैसे दिन में दीपक की शोभा जाती रहती है। सीताजी के सुख को किस भाँति वर्णन किया जाय; जैसे चातकी स्वाती का जल पा गयी हो।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “धनुषभंग” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २६३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा शिवधनुष-भंग और सभा में हर्षोल्लास का वर्णन है।

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धनुषभंग