झाँझि मृदंग संख सहनाई

चौपाई १, दोहा २६३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई॥ बाजहिं बहु बाजने सुहाए। जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए॥ १ ॥

अर्थ

झाँझ, मृदंग, शंख, शहनाई, भेरी, ढोल और सुहावने दुंदुभि आदि बहुत प्रकार के सुन्दर बाजे बज रहे हैं। जहाँ-तहाँ युवतियाँ मंगल गीत गा रही हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “धनुषभंग” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २६३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा शिवधनुष-भंग और सभा में हर्षोल्लास का वर्णन है।

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धनुषभंग