गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा
गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा
चौपाई ३, दोहा २६१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा॥ दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ॥ ३ ॥
अर्थ
मन-ही-मन उन्होंने गुरु को प्रणाम किया और बड़ी फुर्ती से धनुष को उठा लिया। जब उसे [हाथ में] लिया, तब वह धनुष बिजली की तरह चमका और फिर आकाश में मण्डल-जैसा हो गया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “धनुषभंग” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २६१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा शिवधनुष-भंग और सभा में हर्षोल्लास का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
धनुषभंग