पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू
पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू
चौपाई ३, दोहा २१७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू॥ मुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू॥ ३ ॥
अर्थ
राजा बार-बार प्रभु को देखते हैं। शरीर पुलकित हो रहा है और हृदय में बड़ा उत्साह है। फिर मुनि की प्रशंसा करके और उनके चरणों में सिर नवाकर राजा उन्हें नगर में लिवा चले।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “राम-लक्ष्मण को देख जनक मुग्ध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २१७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण के मनोहर रूप को देख जनकजी की प्रेममुग्धता और ब्रह्मसुख-विस्मृति का वर्णन है।
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राम-लक्ष्मण को देख जनक मुग्ध