सहज बिरागरूप मनु मोरा

चौपाई २, दोहा २१६ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥ ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ॥ २ ॥

अर्थ

मेरा मन जो स्वभाव से ही वैराग्यरूप [बना हुआ] है, [इन्हें देखकर] इस तरह मुग्ध हो रहा है जैसे चन्द्रमा को देखकर चकोर। हे प्रभो! इसलिये मैं आपसे सत्य भाव से पूछता हूँ। हे नाथ! बताइये, छिपाव न कीजिये।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “राम-लक्ष्मण को देख जनक मुग्ध” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २१६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण के मनोहर रूप को देख जनकजी की प्रेममुग्धता और ब्रह्मसुख-विस्मृति का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
राम-लक्ष्मण को देख जनक मुग्ध