लखन हृदयँ लालसा बिसेषी

चौपाई १, दोहा २१८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी॥ प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं॥ १ ॥

अर्थ

लक्ष्मणजी के हृदय में विशेष लालसा है कि जाकर जनकपुर देख आवें। परन्तु प्रभु श्रीरामचन्द्रजी का भय है और फिर मुनि से भी सकुचाते हैं। इसलिये प्रकट में कुछ नहीं कहते; मन ही मन मुसकरा रहे हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “राम-लक्ष्मण को देख जनक मुग्ध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २१८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण के मनोहर रूप को देख जनकजी की प्रेममुग्धता और ब्रह्मसुख-विस्मृति का वर्णन है।

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राम-लक्ष्मण को देख जनक मुग्ध