इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा

चौपाई ३, दोहा २१६ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥ कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका॥ ३ ॥

अर्थ

इनको देखते ही अत्यन्त प्रेम के वश होकर मेरे मन ने जबर्दस्ती ब्रह्मसुख को त्याग दिया है। मुनि ने हँसकर कहा—हे राजन्! आपने ठीक कहा। आपका वचन मिथ्या नहीं हो सकता।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “राम-लक्ष्मण को देख जनक मुग्ध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २१६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण के मनोहर रूप को देख जनकजी की प्रेममुग्धता और ब्रह्मसुख-विस्मृति का वर्णन है।

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राम-लक्ष्मण को देख जनक मुग्ध