कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा
कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा
चौपाई १, दोहा २१५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा॥ बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे॥ १ ॥
अर्थ
राजा ने मुनि के चरणों पर मस्तक रखकर प्रणाम किया। मुनियों के स्वामी विश्वामित्रजी ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया। फिर सारी ब्राह्मणमण्डली को आदरसहित प्रणाम किया और अपना बड़ा भाग्य जानकर राजा आनन्दित हुए।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “राम-लक्ष्मण को देख जनक मुग्ध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २१५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण के मनोहर रूप को देख जनकजी की प्रेममुग्धता और ब्रह्मसुख-विस्मृति का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
राम-लक्ष्मण को देख जनक मुग्ध