आतुर सभय गहेसि पद जाई

चौपाई ६, दोहा २ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई॥ अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई॥ ६ ॥

अर्थ

आतुर और भयभीत जयन्त ने जाकर श्रीरामजी के चरण पकड़ लिये [और कहा—] हे दयालु रघुनाथजी! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपके अतुलित बल और अतुलित प्रभुता को मैं मन्दबुद्धि समझ न पाया था।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जयन्त द्वारा कौए का रूप धरकर सीताजी को कष्ट देने और श्रीराम के बाण से भयभीत होकर शरण लेने का वर्णन है।

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जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति