भा निरास उपजी मन त्रासा
भा निरास उपजी मन त्रासा
चौपाई २, दोहा २ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा॥ ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका॥ २ ॥
अर्थ
तब वह निराश हो गया, उसके मन में त्रास उत्पन्न हुआ; जैसे दुर्वासा ऋषि को चक्र से भय हुआ था। वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि सब लोकों में थका हुआ, व्याकुल होकर भय और शोक से फिरता रहा।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जयन्त द्वारा कौए का रूप धरकर सीताजी को कष्ट देने और श्रीराम के बाण से भयभीत होकर शरण लेने का वर्णन है।
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जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति