पुर नर भरत प्रीति मैं गाई

चौपाई १, दोहा १ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई॥ अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन॥ १ ॥

अर्थ

पुरवासियों के और भरतजी के अनुपम और सुन्दर प्रेम का मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार गान किया। अब प्रभु के अत्यन्त पावन चरित्र सुनो, जो वन में देव, नर और मुनियों को भावते हैं।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जयन्त द्वारा कौए का रूप धरकर सीताजी को कष्ट देने और श्रीराम के बाण से भयभीत होकर शरण लेने का वर्णन है।

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जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति