काहूँ बैठन कहा न ओही

चौपाई ३, दोहा २ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही॥ मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना॥ ३ ॥

अर्थ

किसी ने उसे बैठने तक के लिये नहीं कहा। श्रीरामजी के द्रोही को कौन रख सकता है? [काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़! सुनिये, उसके लिये माता मृत्यु के समान, पिता यमराज के समान और अमृत विष के समान हो जाता है।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जयन्त द्वारा कौए का रूप धरकर सीताजी को कष्ट देने और श्रीराम के बाण से भयभीत होकर शरण लेने का वर्णन है।

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जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति