निज कृत कर्म जनित फल पायउँ
निज कृत कर्म जनित फल पायउँ
चौपाई ७, दोहा २ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ॥ सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी॥ ७ ॥
अर्थ
अपने किये हुए कर्म से उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया। अब हे प्रभु! आपकी शरण तककर आया हूँ। [शिवजी कहते हैं—] हे पार्वती! कृपालु श्रीरघुनाथजी ने उसकी अत्यन्त आर्त वाणी सुनकर उसे एक नेत्र वाला करके छोड़ दिया।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति” प्रकरण का चौपाई ७, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जयन्त द्वारा कौए का रूप धरकर सीताजी को कष्ट देने और श्रीराम के बाण से भयभीत होकर शरण लेने का वर्णन है।
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जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति