मित्र करइ सत रिपु कै करनी
मित्र करइ सत रिपु कै करनी
चौपाई ४, दोहा २ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी॥ सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥ ४ ॥
अर्थ
मित्र सैकड़ों शत्रुओं-सी करनी करने लगता है। देवताओं की नदी उसके लिये वैतरणी हो जाती है। हे भाई! सुनिये, जो श्रीरघुबीर से विमुख होता है, समस्त जगत् उसके लिये अग्नि से भी अधिक गरम हो जाता है।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जयन्त द्वारा कौए का रूप धरकर सीताजी को कष्ट देने और श्रीराम के बाण से भयभीत होकर शरण लेने का वर्णन है।
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जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति