कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि
कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि
सोरठा २ · अरण्यकाण्ड
सोरठा पाठ
कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित। प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम॥ २ ॥
अर्थ
उसने मोहवश द्रोह किया था, इसलिए यद्यपि उसका वध ही उचित था, पर प्रभु ने कृपा करके उसे छोड़ दिया। श्रीरामजी के समान कृपालु और कौन होगा?
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति” प्रकरण का सोरठा २ है। इस प्रकरण में जयन्त द्वारा कौए का रूप धरकर सीताजी को कष्ट देने और श्रीराम के बाण से भयभीत होकर शरण लेने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति