एक बार चुनि कुसुम सुहाए
एक बार चुनि कुसुम सुहाए
चौपाई २, दोहा १ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए॥ सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर॥ २ ॥
अर्थ
एक बार सुन्दर फूल चुनकर श्रीरामजी ने अपने हाथों से भूषण बनाये। प्रभु ने आदर के साथ उन भूषणों को श्रीसीताजी को पहनाया और सुन्दर स्फटिकशिला पर बैठे।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जयन्त द्वारा कौए का रूप धरकर सीताजी को कष्ट देने और श्रीराम के बाण से भयभीत होकर शरण लेने का वर्णन है।
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जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति