रघुपति भगति सजीवन मूरी
रघुपति भगति सजीवन मूरी
चौपाई ४, दोहा १२२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥ एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥ ४ ॥
अर्थ
श्रीरघुनाथजी की भक्ति संजीवनी जड़ी है। श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवा के साथ लिया जानेवाला मधु आदि) है। इस प्रकार का संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जाएँ, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नों से भी नहीं जाते।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भजन महिमा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १२२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हरि भजन और प्रभु के नाम-स्मरण से भवसागर पार होने की महिमा का वर्णन है।
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भजन महिमा