एहि बिधि सकल जीव जग रोगी
एहि बिधि सकल जीव जग रोगी
चौपाई १, दोहा १२२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी॥ मानस रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए॥ १ ॥
अर्थ
इस प्रकार जगत् में समस्त जीव रोगी हैं, जो शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोग के दुःख से और भी दुखी हो रहे हैं। मैंने ये थोड़े-से मानस-रोग कहे हैं। ये हैं तो सबको, परन्तु इन्हें जान पाए हैं कोई विरले ही।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भजन महिमा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १२२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हरि भजन और प्रभु के नाम-स्मरण से भवसागर पार होने की महिमा का वर्णन है।
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भजन महिमा