तृषा जाइ बरु मृगजल पाना

चौपाई ९, दोहा १२२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना॥ अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै॥ ९ ॥

अर्थ

मृगतृष्णा के जल को पीने से भले ही प्यास बुझ जाय, खरगोश के सिर पर भले ही सींग निकल आवें, अंधकार भले ही सूर्य का नाश कर दे; परन्तु श्रीराम से विमुख होकर जीव सुख नहीं पा सकता।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “भजन महिमा” प्रकरण का चौपाई ९, दोहा १२२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हरि भजन और प्रभु के नाम-स्मरण से भवसागर पार होने की महिमा का वर्णन है।

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भजन महिमा