जाने ते छीजहिं कछु पापी
जाने ते छीजहिं कछु पापी
चौपाई २, दोहा १२२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी॥ बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे॥ २ ॥
अर्थ
प्राणियों को जलाने वाले ये पापी (रोग) जान लिये जाने से कुछ क्षीण अवश्य हो जाते हैं, परन्तु नाश को नहीं प्राप्त होते। विषय-रूप कुपथ्य पाकर ये मुनियों के हृदय में भी अंकुरित हो उठते हैं, तब बेचारे साधारण मनुष्य तो क्या चीज हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भजन महिमा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १२२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में हरि भजन और प्रभु के नाम-स्मरण से भवसागर पार होने की महिमा का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
भजन महिमा