बारि मथें घृत होइ बरु सिकता
बारि मथें घृत होइ बरु सिकता
दोहा १२२ (क) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल। बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥ १२२ (क) ॥
अर्थ
जल को मथने से भले ही घी उत्पन्न हो जाय और बालू को पेरने से भले ही तेल निकल आवे; परन्तु श्रीहरि के भजन बिना संसाररूपी समुद्र से नहीं तर जा सकता, यह सिद्धान्त अटल है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भजन महिमा” प्रकरण का दोहा १२२ (क) है। इस प्रकरण में हरि भजन और प्रभु के नाम-स्मरण से भवसागर पार होने की महिमा का वर्णन है।
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भजन महिमा