तव उर कुमति बसी बिपरीता
तव उर कुमति बसी बिपरीता
चौपाई ४, दोहा ४० के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥ कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥ ४ ॥
अर्थ
आपके हृदय में उलटी बुद्धि आ बसी है। इसी से आप हित को अहित और रिपु को मित्र मान रहे हैं। जो राक्षस कुल के लिये कालरात्रि [के समान] हैं, उन सीता पर आपकी बड़ी प्रीति है।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की रावण को सलाह” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण द्वारा रावण को नीति-उपदेश और रावण के अपमान के बाद विभीषण का लंका-त्याग निश्चय का वर्णन है।
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विभीषण की रावण को सलाह