उमा संत कइ इहइ बड़ाई
उमा संत कइ इहइ बड़ाई
चौपाई ४, दोहा ४१ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥ तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥ ४ ॥
अर्थ
[शिवजी कहते हैं--] हे उमा! संत की यही बड़ाई (महिमा) है कि वे बुराई करने पर भी [बुराई करने वाले की] भलाई ही करते हैं। [विभीषणजी ने कहा--] आप मेरे पिता के समान हैं, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया; परन्तु हे नाथ! आपका भला श्रीरामजी को भजने में ही है।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की रावण को सलाह” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण द्वारा रावण को नीति-उपदेश और रावण के अपमान के बाद विभीषण का लंका-त्याग निश्चय का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
विभीषण की रावण को सलाह