जिअसि सदा सठ मोर जिआवा

चौपाई २, दोहा ४१ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥ कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥ २ ॥

अर्थ

ओरे मूर्ख! तू जीता तो है सदा मेरा जिलाया हुआ (अर्थात्‌ मेरे ही अन्न से पल रहा है), पर हे मूढ! पक्ष तुझे शत्रु का ही अच्छा लगता है। अरे दुष्ट! बता न, जगत् में ऐसा कौन है जिसे मैंने अपनी भुजाओं के बल से न जीता हो?

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की रावण को सलाह” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण द्वारा रावण को नीति-उपदेश और रावण के अपमान के बाद विभीषण का लंका-त्याग निश्चय का वर्णन है।

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विभीषण की रावण को सलाह