सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा
चौपाई ४, दोहा ३९ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥ जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥ ४ ॥
अर्थ
जिसे सम्पूर्ण जगत् से द्रोह करने का पाप लगा है, शरण जाने पर प्रभु उसका भी त्याग नहीं करते। जिनका नाम तीनों तापों का नाश करनेवाला है, वे ही प्रभु (भगवान्) मनुष्यरूप में प्रकट हुए हैं। हे रावण! हृदय में यह समझ लीजिये।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की रावण को सलाह” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण द्वारा रावण को नीति-उपदेश और रावण के अपमान के बाद विभीषण का लंका-त्याग निश्चय का वर्णन है।
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विभीषण की रावण को सलाह