पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन

चौपाई २, दोहा ३८ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन॥ जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥ २ ॥

अर्थ

फिर वे सिर नवाकर अपने आसन पर बैठ गये और आज्ञा पाकर ये वचन बोले-हे कृपालु! जब आपने मुझसे बात (राय) पूछी ही है तो हे तात! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपके हित की बात कहता हूँ—।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की रावण को सलाह” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण द्वारा रावण को नीति-उपदेश और रावण के अपमान के बाद विभीषण का लंका-त्याग निश्चय का वर्णन है।

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विभीषण की रावण को सलाह