निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती
निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती
चौपाई २, दोहा १०० के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती॥ करति बिलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी॥ २ ॥
अर्थ
वे रात्रि और चन्द्रमा की बहुत प्रकार से निन्दा कर रही हैं [और कह रही हैं--] रात युग के समान बड़ी हो गयी, वह बीतती ही नहीं। जानकीजी श्रीरामजी के विरह में दुःखी होकर मन-ही-मन भारी विलाप कर रही हैं।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “त्रिजटा-सीता संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १०० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में त्रिजटा द्वारा सीताजी को युद्ध-समाचार देकर धैर्य बँधाने और राम-विजय का आश्वासन देने का वर्णन है।
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त्रिजटा-सीता संवाद