अस कहि बहुत भाँति समुझाई
अस कहि बहुत भाँति समुझाई
चौपाई १, दोहा १०० के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई॥ राम सुभाउ सुमिरि बैदेही। उपजी बिरह बिथा अति तेही॥ १ ॥
अर्थ
ऐसा कहकर और सीताजी को बहुत प्रकार से समझाकर फिर त्रिजटा अपने भवन चली गयी। श्रीरामचन्द्रजी के स्वभाव का स्मरण करके जानकीजी को अत्यन्त विरह-व्यथा उत्पन्न हुई।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “त्रिजटा-सीता संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १०० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में त्रिजटा द्वारा सीताजी को युद्ध-समाचार देकर धैर्य बँधाने और राम-विजय का आश्वासन देने का वर्णन है।
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त्रिजटा-सीता संवाद