रघुपति बिरह सबिष सर भारी

चौपाई ५, दोहा ९९ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

रघुपति बिरह सबिष सर भारी। तकि तकि मार बार बहु मारी॥ ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना। सोइ बिधि ताहि जिआव न आना॥ ५ ॥

अर्थ

जो श्री रघुनाथजी के विरह-रूपी बड़े विषैले बाणों से तक-तककर मुझे बहुत बार मारकर, अब भी मार रहा है और ऐसे दुःख में भी जो मेरे प्राणों को रख रहा है, वही विधाता उस (रावण) को जिला रहा है, दूसरा कोई नहीं।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “त्रिजटा-सीता संवाद” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ९९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में त्रिजटा द्वारा सीताजी को युद्ध-समाचार देकर धैर्य बँधाने और राम-विजय का आश्वासन देने का वर्णन है।

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त्रिजटा-सीता संवाद